उलझा हुआ सुरूर

शहनाईयों की दस्तक है
पर खुशियों का आलम दूर है
न जाने किस इत्तफाक से
उलझा हुआ सुरूर है

खोया-खोया सा दिन है
खोई-खोई सी रात
न जाने किस उलझन में
गुम हुई शाम है

सहमा हुआ सा चाँद है
सिसकता हुआ गगन है
न जाने किस बात पे
जगत भी मगन है

कितनी अकेली आज
कितनी अकेली
जिंदगी भी हाय
ये कैसी पहेली

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