ठंडी-ठंडी हवा

ऐ ठंडी-ठंडी हवा
क्यूँ इतना इतरा रही
क्यूँ इतने प्रचंड वेग से
भाव खा रही हो

सर्दी की निष्ठुरता को
और बढ़ाये जा रही हो
सिहरन और ठिठुरन भी
बढ़ाये जा रही हो

ठिठुर रही है धरती सारी
ठिठुरता गगन भी
देख तेरी कातिल अदायें
करता तुझे नमन भी

त्याग दे अब तू
अपना विकराल रूप
दिखा दे तू सबको
अपना अविरल स्वरुप

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